
महत्व
पितृ पक्ष भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या (सर्व पितृ अमावस्या) तक 16 दिनों का होता है। इन 16 दिनों में हमारे पूर्वजों की आत्माएं पितृ लोक से उतरकर पृथ्वी पर आती हैं — उनकी संतानों से श्राद्ध और तर्पण की आशा लेकर।
पितृ दोष — जो जन्म कुंडली में सूर्य, चंद्र या शनि के पितृ भाव में पीड़ित होने से बनता है — परिवार में विवाह देरी, संतान कठिनाई, व्यापार में बाधाएं और अकारण रोग उत्पन्न करता है। पितृ पक्ष में श्राद्ध करने से इस दोष में काफी राहत मिलती है।
गया (बिहार), काशी (वाराणसी), प्रयागराज और हरिद्वार — पितृ तर्पण के लिए सबसे पवित्र स्थान हैं। गया का पितृ पूजन विशेष रूप से मोक्षदायी माना जाता है।
परंपराएं और अनुष्ठान
श्राद्ध
पूर्वजों की मृत्यु तिथि पर विशेष अनुष्ठान — पंडित द्वारा मंत्रों से तर्पण।
तर्पण
जल में तिल और जौ मिलाकर पूर्वजों को अर्पण — उनकी तृप्ति के लिए।
पिंड दान
चावल, तिल और शहद के पिंड — पूर्वजों को भोजन का प्रतीक।
ब्राह्मण भोजन
पंडित जी को भोजन कराना — पूर्वजों तक उनकी तृप्ति पहुँचाने का माध्यम।
इस पर्व पर अनुशंसित पूजा

पौराणिक कथा
महाभारत में कर्ण की मृत्यु के बाद जब वे स्वर्ग पहुँचे, उन्हें सोना-चाँदी खाने को मिला — असली भोजन नहीं। इंद्र ने बताया: तुमने जीवन भर दान तो किया, पर पूर्वजों को कभी अन्न-जल नहीं दिया। कर्ण को 16 दिनों के लिए पृथ्वी पर भेजा गया — उन्होंने श्राद्ध किया। तब से पितृ पक्ष की परंपरा चली।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
पितृ दोष के क्या संकेत हैं?
श्राद्ध किस तिथि को करें?
क्या ऑनलाइन श्राद्ध होता है?
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