"ॐ त्र्यम्बकं यजामहे..." — इस मंत्र के हर शब्द में छुपा है जीवन, मृत्यु और मोक्ष का रहस्य। जानें पूरा अर्थ और सही जाप विधि।
महामृत्युंजय मंत्र
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्॥
यह मंत्र ऋग्वेद के 7वें मंडल में महर्षि वशिष्ठ को प्राप्त हुआ था। बाद में इसे यजुर्वेद में भी स्थान मिला। यह मंत्र भगवान शिव के उस रूप को संबोधित है जो मृत्यु को भी जीत लेते हैं।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
त्र्यम्बकम् = तीन नेत्रों वाले (भगवान शिव); यजामहे = हम पूजा करते हैं; सुगन्धिम् = सुगंधित (जीवनदायी शक्ति); पुष्टिवर्धनम् = पोषण बढ़ाने वाले।
उर्वारुकम् = ककड़ी (एक फल); इव = की तरह; बन्धनात् = बंधन से; मृत्योः = मृत्यु से; मुक्षीय = मुक्त कर दें; मा = नहीं; अमृतात् = अमरत्व से।
भावार्थ
हम तीन नेत्रों वाले भगवान शिव की पूजा करते हैं जो सुगंध की तरह जीवन में व्याप्त हैं और हमारे पोषण को बढ़ाते हैं। हे प्रभु! जिस प्रकार पकी ककड़ी अपने आप बेल से अलग हो जाती है, उसी प्रकार हमें मृत्यु के बंधन से मुक्त कर दें — लेकिन अमरत्व (मोक्ष) से वंचित न करें।
यह प्रार्थना यह नहीं कहती कि "मुझे मरने मत दो।" यह कहती है — "मुझे मृत्यु के भय से मुक्त करो और मोक्ष प्रदान करो।" यही इस मंत्र की महानता है।
ककड़ी का रूपक क्यों?
ककड़ी एक अद्भुत रूपक है। जब तक ककड़ी कच्ची होती है, वह बेल से जुड़ी रहती है। जब पूरी तरह पक जाती है, तो वह बिना किसी बल लगाए, अपने आप अलग हो जाती है। मृत्यु का उत्तम स्वरूप ऐसा ही है — जब जीव पूर्ण हो जाता है, तो मृत्यु केवल एक स्वाभाविक परिवर्तन है।
यह रूपक हमें मृत्यु को भय की दृष्टि से नहीं, बल्कि एक परिपक्वता की दृष्टि से देखने की शिक्षा देता है।
जाप विधि और लाभ
इस मंत्र का जाप रुद्राक्ष माला पर करना सर्वोत्तम है। ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से 1.5 घंटे पहले) में जाप विशेष फलदायी है। न्यूनतम 108 बार जाप करें।
गंभीर रोग, दुर्घटना के भय, या किसी प्रिय की बीमारी में 1.25 लाख बार के महामृत्युंजय जाप का अनुष्ठान कराया जाता है। यह पूजा सामूहिक रूप से विद्वान पंडितों द्वारा की जाती है।
