
महत्व
आषाढ़ी एकादशी, जिसे देवशयनी एकादशी भी कहते हैं, आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाई जाती है। इस दिन से भगवान विष्णु योगनिद्रा में चले जाते हैं और कार्तिक शुक्ल एकादशी (देवोत्थान) तक सोते रहते हैं।
वारकरी संप्रदाय के लिए यह सबसे पवित्र दिन है। पंढरपुर की वारी — लाखों भक्तों की पैदल यात्रा — इसी दिन अपने चरम पर पहुँचती है। संत ज्ञानेश्वर, संत तुकाराम और संत नामदेव की परंपरा इस दिन जीवंत हो उठती है।
इस दिन व्रत करने से 1,000 अश्वमेध यज्ञ और 100 राजसूय यज्ञ के समान पुण्य मिलता है। सत्यनारायण पूजा इस दिन की जाती है क्योंकि भगवान विष्णु के शयन से पहले उनकी विशेष आराधना की परंपरा है।
परंपराएं और अनुष्ठान
एकादशी व्रत
पूरे दिन अन्न त्याग, फलाहार, भगवान विष्णु का ध्यान और तुलसी पत्र अर्पण।
विष्णु सहस्रनाम
भगवान विष्णु के 1,000 नामों का पाठ — इस दिन विशेष रूप से प्रभावी।
तुलसी पूजन
तुलसी माता की विशेष पूजा — विष्णु की प्रिया, उनकी शयन से पहले।
सत्यनारायण कथा
देवशयनी से पहले भगवान की प्रसन्नता के लिए कथा और प्रसाद।
इस पर्व पर अनुशंसित पूजा

पौराणिक कथा
एक बार महाराज मान्धाता ने ऋषि पुलस्त्य से पूछा कि एकादशी का इतना महत्व क्यों है। ऋषि ने बताया: जब भगवान विष्णु ने देखा कि पृथ्वी पर पाप बढ़ रहे हैं, तो उन्होंने एक देवी को उत्पन्न किया जो एकादशी थी। उन्होंने कहा — जो मेरे योगनिद्रा के आरंभ और समाप्ति के दिन उपवास करेगा, उसके सभी पाप नष्ट होंगे।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
आषाढ़ी एकादशी का व्रत कैसे रखें?
क्या इस दिन ऑनलाइन पूजा बुक कर सकते हैं?
आषाढ़ी से देवोत्थान तक क्या नहीं करना चाहिए?
आषाढ़ी एकादशी पर पूजा बुक करें
आपके नाम और गोत्र से विधिवत पूजा — video प्रमाण और प्रसाद घर पर।