बगलामुखी देवी पीतवर्णा हैं और शत्रु-स्तंभन, वाद-विवाद विजय और न्यायिक सुरक्षा के लिए पूजी जाती हैं। जानें उनकी उत्पत्ति, स्वरूप और साधना।
बगलामुखी महाविद्या का स्वरूप
दस महाविद्याओं में बगलामुखी आठवीं हैं। "बगला" शब्द "वल्गा" से आया है जिसका अर्थ है — लगाम या रोकना। ये शत्रुओं की वाणी, बुद्धि और शक्ति को स्तंभित (paralise) करने वाली देवी हैं।
इनका वर्ण पीला है — पीत वस्त्र, पीले आभूषण, पीले फूल। इनके हाथ में मुद्गर (गदा) है जिससे वे शत्रु का सिर पीटती हैं और उसकी जीभ खींचती हैं।
उत्पत्ति कथा
सतयुग में एक भयानक तूफान आया जो सृष्टि को नष्ट करने वाला था। देवताओं ने सौराष्ट्र में हरिद्रा सरोवर (पीले पानी की झील) के पास तपस्या की। वहां से प्रकट हुईं बगलामुखी — पीतवर्णी, पीत कमल पर आसीन — और उन्होंने तूफान को क्षण भर में स्तंभित कर दिया।
तब से ये "ब्रह्मास्त्र विद्या" के नाम से भी जानी जाती हैं।
बगलामुखी पूजा के लाभ
न्यायालय के मामलों में विजय, शत्रुओं का स्तंभन, विरोधियों की बोलती बंद करना, किसी षड्यंत्र से सुरक्षा। राजनेता, वकील, व्यापारी और जो लोग प्रतिस्पर्धा वाले क्षेत्र में काम करते हैं — उनके लिए यह विद्या विशेष रूप से फलदायी है।
हवन में पीली सरसों, पीले फूल और हल्दी का प्रयोग होता है। मंत्र जाप के लिए हल्दी की माला सर्वोत्तम है।
