हर वर्ष भाद्रपद में पितृ पक्ष आता है — 16 दिन जब हम अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध और तर्पण करते हैं। जानें पूरी विधि।
पितृ पक्ष क्या है?
हिंदू पंचांग के अनुसार भाद्रपद मास की शुक्ल पूर्णिमा से आश्विन मास की अमावस्या (महालया) तक 16 दिन पितृ पक्ष कहलाते हैं। इस काल में पितृलोक के द्वार खुलते हैं और हमारे पूर्वज पृथ्वी पर आते हैं।
इन 16 दिनों में पुत्र, पौत्र और परिजन अपने दिवंगत परिवारजनों के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंड दान करते हैं।
श्राद्ध की विधि
श्राद्ध उस तिथि को किया जाता है जिस तिथि को पूर्वज का निधन हुआ था। यदि तिथि ज्ञात न हो तो अमावस्या (सर्वपितृ श्राद्ध) पर किया जाता है। विधि में तर्पण (जल अर्पण), पिंड दान (चावल के गोले), ब्राह्मण भोज और गाय-कौवे को भोजन शामिल है।
तर्पण में तिल और जल मिलाकर पूर्वजों के नाम पर हथेली से जल प्रवाहित किया जाता है। यह क्रिया पूर्वजों की आत्मा को तृप्त करती है।
पितृ दोष और उसके संकेत
यदि पूर्वजों का यथाविधि अंतिम संस्कार और श्राद्ध न किया जाए, तो पितृ दोष बन सकता है। इसके संकेतों में शामिल हैं: पीढ़ी-दर-पीढ़ी आर्थिक समस्याएं, संतान न होना या संतान को परेशानी, घर में बार-बार बीमारी और वैवाहिक जीवन में विवाद।
पितृ दोष निवारण के लिए त्र्यंबकेश्वर में विशेष "त्रिपिंडी श्राद्ध" और "नारायण नागबलि" पूजा होती है।
